Ban on e-Cigarettes in India: आज की युवा पीढ़ी जिस आधुनिक ‘कूल’ दिखने वाले शौक की ओर तेजी से भाग रही है, वह वास्तव में एक साइलेंट किलर है। हम बात कर रहे हैं वेप (Vape) या ई-सिगरेट की। भले ही केंद्र सरकार ने इसके खतरों को देखते हुए सालों पहले कानून बना दिया हो।
लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। Ban on e-Cigarettes in India की धज्जियां उड़ रही हैं। दैनिक भास्कर के रिपोर्ट के अनुसार आज भी देश के कई राज्यों, विशेषकर राजस्थान के बड़े शहरों में यह ज़हर धड़ल्ले से बिक रहा है और युवा इसे धुआं बनाकर अपनी सेहत उड़ा रहे हैं।
Table of Contents
- e-Cigarettes क्या होते हैं और वे पारंपरिक सिगरेट से कैसे अलग हैं?
- भारत में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध: कानून की किताबों और ज़मीन का अंतर
- क्या IPL के खिलाड़ी e-Cigarettes पीते हैं? चौंकाने वाला सच
- CDC और MHRA की चेतावनी: e-Cigarettes के नुकसान और स्वास्थ्य पर प्रहार
- एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सवाल: क्या वापिंग से क्रिएटिनिन लेवल बढ़ सकता है?
- संसद में गूंजा मुद्दा: केंद्र सरकार का रुख और ड्रग्स का खतरा
- जागरूक नागरिक ही बदलेंगे तस्वीर
e-Cigarettes क्या होते हैं और वे पारंपरिक सिगरेट से कैसे अलग हैं?
सबसे पहले हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि e-Cigarettes क्या होता है? ई-सिगरेट (इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट) एक बैटरी से चलने वाला उपकरण है। इसमें एक लिक्विड भरा होता है, जिसमें निकोटिन, कृत्रिम फ्लेवर और कई खतरनाक प्रोपलीन ग्लाइकोल जैसे रसायन होते हैं। जब कोई कश लगाता है, तो बैटरी इस लिक्विड को गर्म करके भाप (Aerosol) में बदल देती है।
कई लोग अक्सर पूछते हैं कि क्या vaping और ई-सिगरेट एक ही हैं? तो इसका सीधा जवाब है—हाँ। ई-सिगरेट का उपयोग करने की प्रक्रिया को ही ‘वापिंग’ (Vaping) कहा जाता है। इसे अक्सर कश लगाने वाले ‘वेप पेन’, ‘पॉड’ या ‘मॉड्स’ भी कहते हैं। दिखने में यह कभी पेन तो कभी पेनड्राइव जैसी लगती है, जिससे माता-पिता भी धोखा खा जाते हैं।
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भारत में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध: कानून की किताबों और ज़मीन का अंतर
अगर हम इतिहास और कानून को देखें, तो भारत सरकार ने साल 2019 में ही (PECA अधिनियम के तहत) इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध केवल कागजों तक ही सीमित नजर आ रहा है। दैनिक भास्कर की एक हालिया खोजी रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान के जयपुर और जोधपुर जैसे महानगरों के हुक्का बार, पान की दुकानों और यहाँ तक कि ऑनलाइन कूरियर के जरिए यह युवाओं तक पहुंच रही है।
सात साल पहले (2019 के अध्यादेश से पहले की शुरुआती राज्य-स्तरीय कोशिशों को मिलाकर) राजस्थान देश का पहला ऐसा राज्य बना था जिसने इस पर सख्ती की बात की थी, लेकिन आज वहीं के क्लबों और पबों में यह खुलेआम बिक रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के सख्त निर्देशों के बावजूद कानून को लागू करने वाली स्थानीय एजेंसियां सुस्त पड़ी हैं, जिससे Ban on e-Cigarettes in India का मुख्य उद्देश्य कहीं खो गया है।
क्या IPL के खिलाड़ी e-Cigarettes पीते हैं? चौंकाने वाला सच
हाल ही में राजस्थान के खेल और युवा गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई। खेल प्रेमियों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या IPL के खिलाड़ी e-Cigarettes पीते हैं? दरअसल, राजस्थान रॉयल्स (Rajasthan Royals) से जुड़े एक बड़े घटनाक्रम और स्थानीय मीडिया इन्वेस्टिगेशन में यह बात सामने आई कि जयपुर के पॉश इलाकों के क्लबों में आईपीएल खिलाड़ियों, मशहूर हस्तियों और रईस घरानों के बच्चों के लिए विशेष रूप से विदेशी फ्लेवर वाले महंगे वेप्स मंगाए जाते हैं।
हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी खिलाड़ी का नाम सीधे तौर पर सामने नहीं आया है, लेकिन खेल जगत और पेज-3 पार्टियों में इसके बढ़ते चलन ने पुलिस और एंटी-टोबैको सेल के कान खड़े कर दिए हैं। जब आदर्श माने जाने वाले क्षेत्रों से जुड़े स्थानों पर ऐसी चीजें मिलती हैं, तो Ban on e-Cigarettes in India के नियमों की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
CDC और MHRA की चेतावनी: e-Cigarettes के नुकसान और स्वास्थ्य पर प्रहार
यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) और यूके की मेडिसिन्स एंड हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स रेगुलेटरी एजेंसी (MHRA) के वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, ई-सिगरेट किसी भी मायने में कम खतरनाक नहीं है।
जब हम e-Cigarettes के नुकसान की बात करते हैं, तो फेफड़ों की गंभीर बीमारी ‘पॉपकॉर्न लंग्स’ (Obliterative Bronchiolitis) का नाम सबसे पहले आता है। इसमें मौजूद डायएसिटिल केमिकल फेफड़ों की छोटी वायु नलिकाओं को हमेशा के लिए ब्लॉक कर देता है। इसके अलावा, एक चालाकी से भरा मिथक यह फैलाया गया है कि इसमें निकोटिन कम होता है, जबकि शोध बताते हैं कि कुछ चीनी वेप्स में 2000 पारंपरिक सिगरेट जितना खतरनाक और गाढ़ा निकोटिन होता है, जो सीधे आपके दिल और दिमाग पर हमला करता है।
एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सवाल: क्या वापिंग से क्रिएटिनिन लेवल बढ़ सकता है?
चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हाल ही में हुए शोधों ने एक और डराने वाला खुलासा किया है। बहुत से युवा पूछते हैं कि क्या वापिंग से क्रिएटिनिन लेवल बढ़ सकता है? जी हां, बिल्कुल बढ़ सकता है। जब आप लगातार वेप का इस्तेमाल करते हैं, तो उसमें मौजूद भारी धातुएं (जैसे लेड, निकेल और क्रोमियम) और निकोटिन आपके रक्तप्रवाह के माध्यम से किडनी (गुर्दे) तक पहुंचते हैं।
निकोटिन रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ता है, जिससे किडनी में रक्त का प्रवाह कम हो जाता है। जब किडनी रक्त को सही से फिल्टर नहीं कर पाती, तो शरीर में कचरा यानी ‘क्रिएटिनिन’ बढ़ने लगता है। बढ़ा हुआ क्रिएटिनिन लेवल सीधे तौर पर किडनी फेलियर का संकेत है। इसलिए, यह सोचना छोड़ दें कि वेप केवल फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है; यह आपकी किडनी को भी अंदर से खोखला कर रहा है।
संसद में गूंजा मुद्दा: केंद्र सरकार का रुख और ड्रग्स का खतरा
संसद में हाल ही में एनडीटीवी (NDTV) की एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार से पूछा गया कि क्या इन ई-सिगरेटों में ड्रग्स या अफीम के अर्क मिलाकर बेचे जा रहे हैं? इस पर केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में Ban on e-Cigarettes in India कानून के तहत पूरी तरह से प्रभावी है, और अभी तक देश में वेप के भीतर ड्रग्स मिले होने का कोई आधिकारिक मामला (Drug-laced vapes) सामने नहीं आया है।
हालांकि, सरकार ने यह माना है कि अवैध रूप से इसकी बिक्री चोरी-छिपे जारी है, जिसे रोकने के लिए राज्यों को कड़े कदम उठाने की जरूरत है। यदि समय रहते इस अवैध आयात और बिक्री पर नकेल नहीं कसी गई, तो Ban on e-Cigarettes in India का कानून केवल फाइलों की शोभा बनकर रह जाएगा।
जागरूक नागरिक ही बदलेंगे तस्वीर
ई-सिगरेट कोई स्टेटस सिंबल नहीं, बल्कि असमय मौत को बुलावा देने का जरिया है। 2000 सिगरेट जितना निकोटिन आपके शरीर को पल-पल बर्बाद कर रहा है। कानून अपना काम कर रहा है, लेकिन एक जागरूक समाज के रूप में हमें अपने बच्चों और दोस्तों को इस लत से बचाना होगा।
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