Pinarayi Vijayan vs Rahul Gandhi: भारतीय राजनीति में विपक्षी एकजुटता का दावा करने वाला INDIA Alliance (इंडिया गठबंधन) एक बार फिर अंदरूनी कलह के चौराहे पर खड़ा नजर आ रहा है। राजनीति में कहा जाता है कि जहां चार बर्तन होंगे।
वहां आवाज तो आएगी ही, लेकिन जब गठबंधन के सबसे बड़े चेहरे राहुल गांधी और केरल के कद्दावर वामपंथी नेता पिनाराई विजयन के बीच जुबानी तीर चलने लगें, तो बात सिर्फ आवाज तक नहीं रहती। Latest Political News in Hindi के गलियारों से एक ऐसी ही बड़ी खबर सामने आई है। जिसने पूरे विपक्षी खेमे में खलबली मचा दी है।
केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और सीपीआई(एम) के दिग्गज नेता पिनाराई विजयन ने Rahul Gandhi Lok Sabha Opposition Leader के राजनीतिक रवैये पर बेहद तीखा हमला बोला है। विजयन का साफ आरोप है कि राहुल गांधी का रवैया गठबंधन को मजबूत करने के बजाय सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को फायदा पहुंचा रहा है।
इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट्स तक में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वाकई Lok Sabha Elections Opposition Unity का यह किला अंदर से ही ढहने लगा है?
Table of Contents
- आखिर क्या है पूरा मामला? ‘गले मिलने’ की उस बात पर बवाल
- Pinarayi Vijayan vs Rahul Gandhi: पिनाराई विजयन का सीधा आरोप ‘राहुल बन रहे हैं बीजेपी के मददगार’
- अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव भी कांग्रेस से नाराज?
- केरल की राजनीति का पुराना पेंच: जहां ‘दोस्त’ भी हैं और ‘दुश्मन’ भी
- Lok Sabha Elections Oppostion Unity पर विश्लेषण
आखिर क्या है पूरा मामला? ‘गले मिलने’ की उस बात पर बवाल
इस पूरे विवाद की जड़ें हाल ही में हुई इंडिया गठबंधन की एक बंद कमरे की बैठक से जुड़ी हैं। बताया जा रहा है कि 9 जून को गठबंधन की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी, जिसका ऑडियो और ट्रांसक्रिप्ट कांग्रेस ने 12 जून को जारी किया। इस बैठक में राहुल गांधी ने केरल की स्थानीय राजनीति का हवाला देते हुए एक ऐसा बयान दे दिया जो वामपंथी नेताओं को चुभ गया।
राहुल गांधी ने कहा था, “हमारी आपस में राजनीतिक लड़ाई है। अगर आप मुझसे उम्मीद करते हैं कि मैं जाऊं और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री (पिनाराई विजयन) को गले लगा लूं—तो मैं ऐसा नहीं कर सकता और न ही करूंगा, क्योंकि केरल में उनके साथ हमारी राजनीतिक जंग जारी है।”
जब कोझिकोड में शनिवार को पत्रकारों ने पिनाराई विजयन से राहुल गांधी के इस बयान पर प्रतिक्रिया मांगी, तो विजयन ने बिल्कुल देसी और बेबाक अंदाज में जवाब दिया।
उन्होंने कहा, “मुझे वैसे भी किसी को गले लगाने की आदत नहीं है। मैं जब भी राहुल गांधी से मिलता हूं, या तो हाथ मिलाता हूं या हाथ जोड़कर नमस्ते करता हूं। लेकिन हां, हमने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाते हुए राहुल गांधी की वह पुरानी तस्वीर जरूर देखी है। मुझे मोदी जी को गले लगाने से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन गठबंधन की बैठक में इस तरह की बातें कहना एक अलग ही राजनीतिक संदेश देता है।”
Pinarayi Vijayan vs Rahul Gandhi: पिनाराई विजयन का सीधा आरोप ‘राहुल बन रहे हैं बीजेपी के मददगार’
विजयन यहीं नहीं रुके, उन्होंने सीधे शब्दों में कहा कि इंडिया गठबंधन आज जिस संकट के दौर से गुजर रहा है। उसकी सबसे बड़ी वजह राहुल गांधी का यही अड़ियल रवैया है। उन्होंने कहा कि जब आप राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े दुश्मन (बीजेपी) से लड़ने की बात करते हैं, तो आपको राज्यों की क्षेत्रीय लड़ाइयों को गठबंधन के आड़े नहीं आने देना चाहिए।
Pinarayi Vijayan vs Rahul Gandhi की यह जंग कोई नई नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय मंच पर इस तरह खुलकर सामने आना यह दिखाता है कि INDIA Alliance Seat Sharing और आपसी तालमेल को लेकर जमीन पर कितनी मुश्किलें हैं। विजयन ने आरोप लगाया कि कांग्रेस पार्टी राजस्थान जैसी जगहों पर खुद की गलतियों के कारण हारी और बिहार में भी उन्होंने गठबंधन में अस्थिरता पैदा की, जिससे बीजेपी का रास्ता आसान हो गया।
अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव भी कांग्रेस से नाराज?
अपने बयान में पिनाराई विजयन ने एक और बड़ा दावा करके कांग्रेस की चिंताएं बढ़ा दी हैं। विजयन ने कहा कि कांग्रेस के इस रवैये से सिर्फ वामपंथी दल ही परेशान नहीं हैं, बल्कि गठबंधन के अन्य बड़े क्षेत्रीय क्षत्रप भी असहज महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि बैठक के दौरान समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता तेजस्वी यादव ने भी कांग्रेस के इस रुख पर अपनी खुलकर आपत्ति जताई थी। इसके अलावा तमिलनाडु में डीएमके (DMK) के साथ भी जो स्थितियां बन रही हैं। वह सबके सामने हैं। विजयन के इस खुलासे से यह साफ होता है कि क्षेत्रीय दल अब राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की ‘बड़े भाई’ वाली भूमिका और उनके फैसलों को आसानी से स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं।
केरल की राजनीति का पुराना पेंच: जहां ‘दोस्त’ भी हैं और ‘दुश्मन’ भी
आम पाठकों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जो वामपंथी दल और कांग्रेस दिल्ली में हाथ में हाथ डालकर चलते हैं। वो केरल में एक-दूसरे के जानी दुश्मन क्यों बन जाते हैं? दरअसल, केरल की राजनीति मुख्य रूप से दो धड़ों के बीच बंटी रही है—एक तरफ कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ (UDF) और दूसरी तरफ सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाला एलडीएफ (LDF)।
केरल विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने पिनाराई विजयन को ‘राइट विंग का कठपुतली’ तक कह दिया था और पूछा था कि केंद्रीय एजेंसियां विजयन से पूछताछ क्यों नहीं कर रही हैं?
इसके जवाब में अब विजयन ने पलटवार करते हुए कहा कि अरविंद केजरीवाल और अन्य नेताओं के मामलों में कांग्रेस ने जिस तरह बीजेपी की जांच एजेंसियों का समर्थन किया था, वह खुद उनके चेहरे पर एक करारा तमाचा है। केरल की यही स्थानीय चुनावी दुश्मनी अब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की एकता में सबसे बड़ा रोड़ा बन रही है।
Lok Sabha Elections Oppostion Unity पर विश्लेषण
अब समय है इस पूरी राजनीतिक उठापटक को बिल्कुल गहराई और निष्पक्षता से समझने का। इंडिया गठबंधन (INDIA Alliance) की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी उसकी विविधता ही है। एक तरफ जहां तमाम क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में मजबूत हैं। वहीं कांग्रेस खुद को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में देखती है।
हमारे विश्लेषण के अनुसार, इस पूरे विवाद में दो मुख्य पहलू नजर आते हैं:
- राहुल गांधी का पक्ष: एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर राहुल गांधी की यह मजबूरी है कि वह केरल जैसे राज्य में अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल नहीं गिरा सकते। अगर वह केरल में वामपंथियों के साथ मंच साझा करते हुए बहुत ज्यादा दोस्ताना रुख दिखाएंगे, तो केरल की स्थानीय कांग्रेस इकाई कमजोर हो जाएगी। जिसका सीधा फायदा वहां बीजेपी उठा सकती है।
- पिनाराई विजयन का पक्ष: विजयन की यह चिंता बिल्कुल जायज है कि अगर राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विकल्प देना है, तो व्यक्तिगत या क्षेत्रीय मतभेदों को सार्वजनिक बयानों में उछालने से बचना चाहिए। इस तरह के बयानों से जनता के बीच यह संदेश जाता है कि विपक्ष अभी भी पूरी तरह एकजुट नहीं है। जिससे नरेंद्र मोदी और बीजेपी के ‘मजबूत और स्थिर सरकार’ वाले नैरेटिव को और ताकत मिलती है।
Pinarayi Vijayan vs Rahul Gandhi: यदि इंडिया गठबंधन को सचमुच एक मजबूत विकल्प के रूप में टिके रहना है, तो कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों को ‘गले मिलने या न मिलने’ जैसी बचकानी बहसों से ऊपर उठकर एक मैच्योर कोऑर्डिनेशन कमेटी बनानी होगी। राजनीति में कोई भी स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता, वहां केवल हितों का गणित होता है। अगर यह गणित सही नहीं बैठा, तो विपक्ष की यह एकजुटता सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगी।







