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Mystery of Nagchandreshwar Temple: भारत में सांपों की पूजा क्यों की जाती है? जाने नागचंद्रेश्वर मंदिर के रहस्य, इतिहास

Mystery of Nagchandreshwar Temple: उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर मंदिर स्थित है। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता बल्कि अपनी अनूठी परंपराओं के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है।

Mystery of Nagchandreshwar Temple: भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता के केंद्र में हमेशा से ही रहस्यमयी जीव और परंपराएं रही हैं। इन्हीं में से एक सबसे गहरा रहस्य है Mystery of Nagchandreshwar Temple की।

उज्जैन की पावन नगरी, जो महाकाल की शरण में बसी है। वहाँ एक ऐसा मंदिर स्थित है। जो साल में सिर्फ 24 घंटे के लिए खुलता है। यह मंदिर न केवल आस्था का प्रतीक है। बल्कि भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं का एक अद्भुत संगम भी है।

इस लेख में हम गहराई से समझेंगे कि आखिर Why is snake worshipped in India? और इस रहस्यमयी मंदिर के पीछे की असल कहानी क्या है।

सांपों की पूजा की क्या है पौराणिक मान्यता?

Mystery of Nagchandreshwar Temple

भारत में नागों को केवल जीव नहीं, बल्कि देवता माना गया है। प्राचीन ग्रंथों और उपनिषदों के अनुसार, नाग पाताल लोक के स्वामी हैं। उनका संबंध सीधे ब्रह्मांड की सुरक्षा से है।

यदि हम गौर करें कि Why does Shiva’s neck have snakes?, तो इसका उत्तर हमें समुद्र मंथन की कथा में मिलता है। भगवान शिव ने जब विश्व के कल्याण के लिए हलाहल विष का पान किया। उस विष की ऊष्णता को शांत करने के लिए नाग ने उनके गले को शीतलता प्रदान की। तभी से नाग शिव के आभूषण बन गए।

इसके अलावा, शेषनाग पर भगवान विष्णु का विश्राम करना यह दर्शाता है कि नाग समय और अनंतता के प्रतीक हैं। यही कारण है कि भारतीय समाज में नागों को उर्वरता, सुरक्षा और दैवीय शक्ति का वाहक मानकर पूजा जाता है।

नागों की उत्पत्ति की कहानी किसी कथा मात्र से कम नहीं है। भारतीय पुराणों (विशेषकर महाभारत और आदि पर्व) के अनुसार, नागों का वंश ईर्ष्या, वरदान और एक महान ऋषि की तपस्या से जुड़ा है।

नागों का जन्म: कश्यप ऋषि और कद्रू की कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के मानस पुत्र ऋषि कश्यप की कई पत्नियाँ थीं। इनमें से दो बहनें थीं—कद्रू और विनता।

वरदान: ऋषि कश्यप ने प्रसन्न होकर दोनों को वरदान मांगने को कहा। विनता ने केवल दो अत्यंत पराक्रमी पुत्र मांगे (जिनसे आगे चलकर गरुड़ और अरुण हुए)। वहीं कद्रू ने एक हजार तेजस्वी और शक्तिशाली पुत्रों की इच्छा जताई।

नाग वंश की शुरुआत: कद्रू ने एक हजार से एक हजार नाग पैदा हुए। यही कारण है कि कद्रू को ‘नागमाता’ कहा जाता है।

कद्रू के प्रमुख और प्रतापी पुत्र शेषनाग, वासुकी, तक्षक हैं।
यद्यपि कद्रू के हजार पुत्र थे, लेकिन इनमें तीन सबसे ज्यादा प्रभावशाली हुए, जिनका जिक्र हमारी संस्कृति में आज भी प्रमुखता से होता है।

  1. शेषनाग (अनंत नाग)

यह कद्रू के सबसे बड़े और सबसे धार्मिक पुत्र थे। अपनी माता और भाइयों की ईर्ष्यालु प्रवृत्ति को देखकर उन्होंने मोह छोड़ दिया और गंधमादन पर्वत पर जाकर घोर तपस्या की।

ब्रह्मा जी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें पूरी पृथ्वी का भार अपने फन पर उठाने का आदेश दिया। वे भगवान विष्णु के परम भक्त और उनकी शैय्या (Ananta Shesha) बने। लक्ष्मण और बलराम को शेषनाग का ही अवतार माना जाता है।

  1. वासुकी

वासुकी अपनी शक्ति और भक्ति के लिए जाने जाते हैं। वे भगवान शिव के परम भक्त थे।

जब देवताओं और असुरों के बीच ‘समुद्र मंथन’ हुआ, तब वासुकी को ही मंदराचल पर्वत के चारों ओर लिपटने वाली रस्सी बनाया गया था। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने इन्हें अपने गले में आभूषण के रूप में स्थान दिया।

  1. तक्षक

तक्षक नागों के राजा के रूप में प्रसिद्ध हुए। ये अपनी चतुरता और प्रतिशोध के लिए जाने जाते हैं।

महाभारत की कथा के अनुसार, राजा परीक्षित (अभिमन्यु के पुत्र) को श्राप मिला था कि उनकी मृत्यु तक्षक के डसने से होगी। तक्षक ने ही उन्हें डसा था, जिसके बाद उनके पुत्र जनमेजय ने ‘सर्प सत्र’ यज्ञ किया था ताकि दुनिया के सभी नाग खत्म हो जाएं।

भारतीय समाज में सांप सांस्कृतिक प्रभाव

Mystery of Nagchandreshwar Temple
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सुरक्षा का प्रतीक:प्राचीन काल में घरों के बाहर या पेड़ों के नीचे ‘नाग पत्थर’ स्थापित किए जाते थे। माना जाता था कि नाग वंश के ये प्रतापी देवता कुल और संपदा की रक्षा करते हैं।

प्रकृति के रक्षक: सांस्कृतिक रूप से नागों को पानी के स्रोतों (कुओं, बावड़ियों) और खजाने का रक्षक माना जाता है। यही कारण है कि गाँवों में आज भी नाग को मारना पाप माना जाता है।

योग और कुंडलिनी: भारतीय योग शास्त्र में मनुष्य के भीतर की ऊर्जा को ‘कुंडलिनी शक्ति’ कहा जाता है। जिसे एक सोए हुए सर्प के रूप में दर्शाया जाता है।

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कश्यप ऋषि और कद्रू की यह संतानें आज भी हमारे धर्म और लोककथाओं में जीवंत हैं। यह कहानी प्रतिशोध, श्राप और अस्तित्व की लड़ाई की एक जबरदस्त गाथा है। यह घटना महाभारत के बाद के काल की है। जब पांडव स्वर्ग जा चुके थे और अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित हस्तिनापुर का शासन संभाल रहे थे।

1. वह श्राप जिसने सब कुछ बदल दिया

एक बार राजा परीक्षित शिकार करते समय प्यास से व्याकुल होकर शमीक ऋषि के आश्रम पहुँचे। ऋषि मौन साधना में थे। इसलिए उन्होंने राजा को कोई जवाब नहीं दिया। क्रोध और थकान के आवेश में आकर परीक्षित ने एक मरा हुआ सांप ऋषि के गले में डाल दिया।

जब ऋषि के पुत्र शृंगी को यह पता चला, तो उन्होंने क्रोध में आकर राजा को श्राप दे दिया कि—”आज से ठीक सातवें दिन नागराज तक्षक के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो जाएगी।”

2. तक्षक की चतुराई और राजा की मृत्यु

राजा परीक्षित ने मृत्यु से बचने के लिए बहुत जतन किए। उन्होंने समुद्र के बीचों-बीच एक ऊँचा खंभा बनवाया और भारी सुरक्षा तैनात की। सातवें दिन तक्षक ब्राह्मण का रूप धरकर राजा के पास जाने की कोशिश करने लगा।

रास्ते में उसे महर्षि कश्यप मिले। जिनके पास जहर उतारने की शक्ति थी। तक्षक ने उन्हें बहुत सारा धन देकर वापस भेज दिया ताकि कोई राजा को बचा न सके।

अंत में, तक्षक एक छोटे कीड़े का रूप धारण कर राजा के पास पहुंचे फलों की टोकरी में छिप गया। जैसे ही राजा ने फल निकाला, तक्षक अपने असली रूप में आया और उन्हें डस लिया। राजा परीक्षित की तत्काल मृत्यु हो गई।

3. जनमेजय का भयंकर प्रतिशोध: ‘सर्प सत्र’ यज्ञ

अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने ब्रह्मांड का सबसे विनाशकारी यज्ञ शुरू किय। जिसका नाम सर्प सत्र (Serpent Sacrifice) है।

यज्ञ की शक्ति: मंत्रों की शक्ति ऐसी थी कि दुनिया के कोने-कोने से सांप खिंचे चले आने लगे और सीधे धधकती अग्नि कुंड में गिरकर भस्म होने लगे।

तक्षक का खौफ: तक्षक डर के मारे इंद्र देव की शरण में गया और उनके सिंहासन से लिपट गया। लेकिन यज्ञ के मंत्र इतने शक्तिशाली थे कि इंद्र के सिंहासन समेत तक्षक अग्नि कुंड की ओर खिंचने लगा।

4. नाग वंश को किसने बचाया?

जब नागों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया, तब नागराज वासुकी ने अपनी बहन मनसा देवी और उनके पुत्र आस्तिक मुनि से मदद मांगी।

आस्तिक मुनि (जो खुद एक महान विद्वान थे) जनमेजय के यज्ञ स्थल पर पहुँचे। उन्होंने अपनी बुद्धिमानी और मधुर वाणी से जनमेजय को प्रसन्न किया। राजा ने उनसे वरदान मांगने को कहा, तो आस्तिक मुनि ने कहा—”हे राजन! इस यज्ञ को यहीं रोक दीजिये और बचे हुए नागों को जीवनदान दीजिये।”

राजा जनमेजय अपने वचन से बंधे थे, इसलिए उन्हें यज्ञ रोकना पड़ा।

इस कथा का सांस्कृतिक महत्व

नाग पंचमी का अंत: कहा जाता है कि जिस दिन यह यज्ञ रुकाथा। वह सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी थी। अग्नि की तपन से जलते हुए नागों के शरीर पर आस्तिक मुनि ने कच्चा दूध डाला था। जिससे उन्हें शांति मिली। यही कारण है कि आज भी नाग पंचमी पर सांपों को दूध चढ़ाने की परंपरा है।

आस्तिक मुनि का नाम: पुराने समय में लोग अपने घरों की दीवारों पर “आस्तिक मुनि की दुहाई” लिखते थे, ताकि सांप घर के अंदर न आएं।

Mystery of Nagchandreshwar Temple: साल में सिर्फ एक दिन खुलने का रहस्य

उज्जैन के विश्वप्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर मंदिर स्थित है । Mystery of Nagchandreshwar Temple की सबसे बड़ी बात यह है कि इसके द्वार साल में केवल एक बार, नागपंचमी के दिन ही खोले जाते हैं।

मान्यता है कि यहाँ नागराज तक्षक स्वयं निवास करते हैं। भक्त पूरे साल इस दिन का इंतजार करते हैं ताकि उन्हें उस दिव्य प्रतिमा के दर्शन हो सकें।

जहाँ शिव-पार्वती एक नाग पर विराजमान हैं। Mystery of Nagchandreshwar Temple का यह पक्ष श्रद्धालुओं के बीच भारी आकर्षण और भय मिश्रित श्रद्धा पैदा करता है।

नागचंद्रेश्वर मंदिर का इतिहास क्या है? (History of Nagchandreshwar Temple)

इतिहासकारों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना और यहाँ की प्रतिमा अत्यधिक प्राचीन है। कहा जाता है कि राजा भोज ने 1050 ईस्वी के आसपास इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

लेकिन यहाँ स्थित प्रतिमा की बनावट इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग बनाती है। आमतौर पर शिव जी नंदी पर विराजमान होते हैं, लेकिन यहाँ वे सर्प शय्या पर बैठे हैं।

History of Nagchandreshwar Temple यह भी बताती है कि यह प्रतिमा 11वीं शताब्दी की है और इसे नेपाल से लाया गया माना जाता है। इस मंदिर की संरचना मराठा काल के दौरान और भी सुदृढ़ की गई। जो आज हमें देखने को मिलती है।

उज्जैन में कौन सा मंदिर है जो साल में एक बार खुलता है?

लोग अक्सर पूछते हैं कि उज्जैन में कौन सा मंदिर है जो साल में एक बार खुलता है?, तो उत्तर हमेशा नागचंद्रेश्वर मंदिर ही आएगा। नागपंचमी की रात 12 बजे इस मंदिर के पट खुलते हैं और अगले दिन रात 12 बजे तक ही दर्शन संभव होते हैं।

शेष 364 दिन यहाँ केवल नागराज तक्षक की उपस्थिति मानी जाती है और कोई भी मनुष्य वहाँ प्रवेश नहीं कर सकता। Mystery of Nagchandreshwar Temple को बनाए रखने के लिए यहाँ कड़ी सुरक्षा और परंपराओं का पालन किया जाता है।

Which temple is guarded by snakes? (कौन सा मंदिर सांपों द्वारा संरक्षित है?)

अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि Which temple is guarded by snakes?। हालांकि भारत में कई नाग मंदिर हैं, लेकिन नागचंद्रेश्वर मंदिर को लेकर यह अटूट विश्वास है कि इसकी रक्षा स्वयं जीवित नागों द्वारा की जाती है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर के गर्भगृह और शिखर के आसपास आज भी गुप्त रूप से नागों का पहरा रहता है। Mystery of Nagchandreshwar Temple का यह रोमांचक पहलू भक्तों के मन में कौतूहल पैदा करता है कि कौन सा मंदिर सांपों द्वारा संरक्षित है? इसका उत्तर स्वरूप उज्जैन का यह शिखर मंदिर सबसे ऊपर आता है।

नाग पंचमी की असली कहानी क्या है?

नाग पंचमी केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है। नाग पंचमी की असली कहानी क्या है? इसका संबंध तक्षक नाग और जनमेजय के नाग यज्ञ से भी जुड़ता है।

जहाँ आस्तिक मुनि ने नागों की रक्षा की थी। उज्जैन में इस दिन का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि Mystery of Nagchandreshwar Temple इसी दिन अपने रहस्यों को भक्तों के लिए खोलता है। भक्त यहाँ आकर सर्प दोष और कालसर्प योग से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।

Mystery of Nagchandreshwar Temple: (नागेश्वर मंदिर का रहस्य क्या है?)

कई लोग भ्रमवश इसे नागेश्वर ज्योतिर्लिंग समझ लेते हैं, लेकिन Mystery of Nagchandreshwar Temple (नागेश्वर मंदिर का रहस्य क्या है?) उससे काफी अलग है। यहाँ का सबसे बड़ा रहस्य वह प्रतिमा है। प्रतिमा में शिव और पार्वती के साथ उनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय भी विराजमान हैं।

वे सब एक दशमुखी सर्प के छत्र के नीचे सुरक्षित हैं। ऐसी प्रतिमा पूरी दुनिया में कहीं और नहीं मिलती। Mystery of Nagchandreshwar Temple का यह कलात्मक और आध्यात्मिक स्वरूप इसे अद्वितीय बनाता है।

भारत में सबसे रहस्यमय मंदिर कौन से हैं?

भारत रहस्यों की भूमि है। यदि हम सूची बनाएं कि भारत में सबसे रहस्यमय मंदिर कौन से हैं?, तो उसमें निम्नलिखित नाम प्रमुखता से आते हैं:

  1. पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल): अपने बंद सातवें दरवाजे के लिए प्रसिद्ध।
  2. कामाख्या देवी मंदिर (असम): जहाँ प्रकृति का चमत्कार दिखता है।
  3. नागचंद्रेश्वर मंदिर (मध्य प्रदेश): साल में एक बार खुलने के कारण Mystery of Nagchandreshwar Temple विश्व प्रसिद्ध है।
  4. लेपाक्षी मंदिर (आंध्र प्रदेश): अपने हवा में झूलते खंभों के लिए जाना जाता है।

सर्प दोष से मुक्ति और मनोवैज्ञानिक प्रभाव

Mystery of Nagchandreshwar Temple के दर्शन मात्र से भक्तों का मानना है कि उनके जीवन से ‘सर्प भय’ खत्म हो जाता है। तकनीकी रूप से देखें तो यह एक ‘Placebo Effect’ या गहरी आस्था का परिणाम हो सकता है।

जहाँ व्यक्ति अपने अवचेतन मन के डर पर विजय पा लेता है। मंदिर की शांति और वहाँ की प्राचीन ऊर्जा भक्तों को एक अलग ही अनुभव प्रदान करती है।

नागचंद्रेश्वर मंदिर की एक अत्यंत दुर्लभ और अनूठी प्रतिमा

नागचंद्रेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ स्थापित 11वीं शताब्दी की दुर्लभ मूर्ति है।

  • यह प्रतिमा नेपाल से लाई गई थी।
  • आमतौर पर भगवान विष्णु को शेषनाग की शय्या पर देखा जाता है, लेकिन यहाँ भगवान शिव और माता पार्वती स्वयं सर्पराज तक्षक के सात फनों पर विराजमान हैं।
  • इस दिव्य प्रतिमा में उनके साथ कार्तिकेय और गणेश जी भी मौजूद हैं।
  • मूर्ति के ऊपरी हिस्से में सूर्य और चंद्रमा की आकृतियाँ भी उकेरी गई हैं。

24 घंटे का विशेष द्वार

इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इसके द्वार साल के 364 दिन बंद रहते हैं。 मंदिर के पट केवल श्रावण शुक्ल पंचमी (नाग पंचमी) को रात 12 बजे खुलते हैं और अगले दिन रात 12 बजे तक, यानी सिर्फ 24 घंटे के लिए ही खुले रहते हैं।

त्रिकाल पूजा का महत्व

नाग पंचमी के दिन यहाँ ‘त्रिकाल पूजा’ की परंपरा है, जिसका अर्थ है तीन विशेष समय पर होने वाली पूजा:

  1. प्रथम पूजा: नाग पंचमी की मध्यरात्रि में महानिर्वाणी संतों द्वारा की जाती है।
  2. द्वितीय पूजा: नाग पंचमी के दिन दोपहर में सरकार (प्रशासन) की ओर से की जाती है।
  3. तृतीय पूजा: नाग पंचमी की शाम को भगवान महाकाल की विशेष पूजा संपन्न होती है।

धार्मिक मान्यताएँ और लाभ

श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि नागचंद्रेश्वर के दर्शन मात्र से जीवन के कई कष्ट दूर हो जाते हैं:

  • माना जाता है कि यहाँ दर्शन करने से सर्प दोष, कालसर्प योग और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।
  • भक्तों का विश्वास है कि इससे मन से सांपों का भय दूर होता है।
  • पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहाँ की पूजा से संतान सुख और लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

यही कारण है कि हर साल नाग पंचमी के दिन देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु इस दुर्लभ अवसर का लाभ उठाने उज्जैन पहुँचते हैं।

क्या यह केवल आस्था है या कोई अनसुलझा रहस्य?

Mystery of Nagchandreshwar Temple को समझने के लिए आपको केवल विज्ञान की नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन परंपराओं की दृष्टि की भी आवश्यकता है। एक ओर जहाँ आधुनिक दुनिया हर चीज़ का प्रमाण मांगती है। वहीं दूसरी ओर नागचंद्रेश्वर मंदिर जैसे स्थान हमें याद दिलाते हैं कि ब्रह्मांड में अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जो हमारी समझ से परे है।

चाहे वह History of Nagchandreshwar Temple हो या यहाँ से जुड़ी पौराणिक कथाएं, हर तत्व हमें प्रकृति और जीवों के प्रति सम्मान करना सिखाता है। अगली बार जब आप उज्जैन जाएं, तो महाकाल के दर्शन के साथ-साथ इस मंदिर के इतिहास को याद करना न भूलें, क्योंकि Mystery of Nagchandreshwar Temple आज भी भारत के सबसे बड़े धार्मिक रहस्यों में से एक है।

FAQs: Mystery of Nagchandreshwar Temple

यहाँ नागचंद्रेश्वर मंदिर (Nagchandreshwar Temple) से जुड़े 5 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर (FAQs) दिए गए हैं:

नागचंद्रेश्वर मंदिर कहाँ स्थित है?

यह मंदिर मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर स्थित है.

यह मंदिर साल में कितनी बार और कब खुलता है?

नागचंद्रेश्वर मंदिर साल में केवल एक बार नागपंचमी के दिन पूरे 24 घंटे के लिए खुलता है.

नागचंद्रेश्वर मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता क्या है?

यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दुर्लभ प्राचीन प्रतिमा है, जिसमें भगवान शिव और माता पार्वती एक विशाल नाग (सर्प शय्या) पर विराजमान हैं. जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता.

इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व क्या है?

माना जाता है कि यहाँ की अद्भुत प्रतिमा 11वीं शताब्दी की है और मंदिर का जीर्णोद्धार परमार राजा भोज ने लगभग 1050 ईस्वी के आसपास करवाया था.

इस मंदिर में दर्शन करने का क्या महत्व माना जाता है?

ऐसी मान्यता है कि नागपंचमी के दिन यहाँ दर्शन करने से जातक को सर्प भय से मुक्ति मिलती है और कुंडली के सर्पदोष या कालसर्प दोष के नकारात्मक प्रभाव कम हो जाते हैं.

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध स्रोतों के गहन शोध पर आधारित है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक Mystery of Nagchandreshwar Temple और भारतीय नाग पूजा परंपरा से जुड़ी जानकारी को रोचक और सरल भाषा में पहुँचाना है।

यद्यपि हमने तथ्यों की सटीकता और प्रामाणिकता सुनिश्चित करने का हरसंभव प्रयास किया है, फिर भी ऐतिहासिक तिथियों, पौराणिक कथाओं और स्थानीय मान्यताओं में भिन्नता संभव है। यदि इस लेख में कोई मानवीय भूल (Human Error) या तकनीकी त्रुटि रह गई हो, तो लेखक उसके लिए क्षमा प्रार्थी है।

किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या यात्रा की योजना बनाने से पहले कृपया आधिकारिक मंदिर प्रबंधन या संबंधित विशेषज्ञों से जानकारी की पुष्टि अवश्य कर लें। यह लेख केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्य के लिए साझा किया गया है।

Shivji Kumar
Shivji Kumarhttp://samvadshiv.com
I am a student and also a bit of a thinker. I am a freelance journalist. I am fond of writing, I have been writing for the last 5 years.
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