RSS Agenda: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक है। 1925 में अपनी स्थापना के बाद से ही यह संगठन भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यक्ति निर्माण का परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। आज के संदर्भ में, जब संघ ने अपने सफर के 100 वर्ष पूरे कर रहे हैं। RSS Agenda और कार्यप्रणाली को लेकर देश-दुनिया में कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं।
आइए विस्तार से समझते हैं कि आरएसएस का मुख्य RSS Agenda क्या है और यह संगठन धरातल पर क्या काम करता है। संघ के इतिहास और व्यक्ति निर्माण के बारे में भी चर्चा करेंगे।
Table of Contents
- History of RSS (आरएसएस की स्थापना और इतिहास)
- इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ाव: आरएसएस (RSS) की स्थापना और मूल विचारधारा
- संघ का मुख्य एजेंडा और लक्ष्य (Core Agenda)
- आरएसएस धरातल पर क्या करता है? (What does RSS do?)
- आरएसएस की दैनिक शाखाएं (The Daily Shakha)
- आरएसएस का आपदा प्रबंधन और सेवा कार्य (Social Service)
- 1962 का भारत-चीन युद्ध: जब नेहरू भी हुए स्वयंसेवकों के मुरीद
- स्वयंसेवकों का वो अभूतपूर्व योगदान
- संकट के समय ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ (सबसे पहले पहुंचने वाले)
- प्रमुख ऐतिहासिक आपदाएं और संघ की भूमिका
- वनवासी कल्याण आश्रम: आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ना
- एकल विद्यालय: सुदूर गांवों में ‘एक शिक्षक, एक स्कूल’ की क्रांति
- सेवा भारती: सेवा का आधिकारिक ‘पावरहाउस’
- संघ का अनुषांगिक संगठन (Affiliated Organizations): संघ परिवार
- अनुषांगिक संगठन क्या होते हैं और ये कैसे काम करते हैं?
- संघ के प्रमुख अनुषांगिक संगठनों की सूची (List of RSS Affiliated Organizations)
- संघ शताब्दी और वैचारिक यात्रा: राष्ट्र निर्माण के 100 वर्ष और संगठन के विस्तार का असली सच
- संघ के विस्तार का अर्थ राष्ट्रीय विचार का विस्तार
- RSS Agenda का वास्तविक सच: एक नज़र में
History of RSS (आरएसएस की स्थापना और इतिहास)

आरएसएस की स्थापना 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के पावन पर्व पर नागपुर में डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। पेशे से डॉक्टर और स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी आंदोलनों से लेकर सत्याग्रह तक सक्रिय रहे डॉ. हेडगेवार के मन में एक मौलिक सवाल था— “हजारों साल पुरानी महान सभ्यता वाला यह देश मुट्ठी भर विदेशियों (मुगलों और अंग्रेजों) का गुलाम क्यों बन गया?”
गहन आत्ममंथन के बाद उन्होंने पाया कि समाज में संगठन की कमी, छुआछूत, आपसी बिखराव और अपनी राष्ट्रीय पहचान के प्रति विस्मृति ही हमारी गुलामी का असली कारण थी। राजनीतिक स्वतंत्रता तो आज नहीं तो कल मिल ही जाएगी, लेकिन अगर समाज का राष्ट्रीय चरित्र और अनुशासन मजबूत नहीं हुआ, तो हम उस स्वतंत्रता को अक्षुण्ण नहीं रख पाएंगे।
इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ाव: आरएसएस (RSS) की स्थापना और मूल विचारधारा
- प्रथम चरण (स्थापना और बीज वपन): शुरुआत में बच्चों और युवाओं को एकत्र कर खेल-कूद और अनुशासन के माध्यम से राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाया गया। डॉ. हेडगेवार के जीवनकाल में ही उनके द्वारा तैयार किए गए शुरुआती स्वयंसेवकों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर शाखाएं लगानी शुरू कीं। इसी दौरान श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर के प्रयासों से महिलाओं के लिए ‘राष्ट्र सेविका समिति‘ की भी शुरुआत हुई।
- द्वितीय चरण (विभाजन और राष्ट्र रक्षा): भारत की आजादी और देश के रक्तरंजित विभाजन के समय स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों की सेवा और सुरक्षा में प्राणपण से योगदान दिया। इस दौर में श्री गुरुजी ने संघ को वैचारिक सुदृढ़ता दी और समाज के हर क्षेत्र (छात्र, मजदूर, शिक्षा, आदिवासी कल्याण) में संगठनों की नींव रखी।
- तृतीय चरण (आपातकाल और जनस्वीकार्यता): 1975 के आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की बहाली के लिए स्वयंसेवकों ने अभूतपूर्व संघर्ष किया, जिसके बाद समाज के बौद्धिक वर्ग में संघ के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी।
- चतुर्थ चरण (शताब्दी वर्ष – 2025/2026): अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे करने पर संघ आज देश की मुख्यधारा का सबसे प्रभावी वैचारिक मार्गदर्शक बन चुका है।
- मूल उद्देश्य: इसका प्राथमिक उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना, चरित्र निर्माण करना और राष्ट्र की सेवा के लिए स्वयंसेवकों को तैयार करना है।
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: संघ ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ (Cultural Nationalism) की विचारधारा पर चलता है। इसके अनुसार, भारत में रहने वाले सभी लोगों की सांस्कृतिक जड़ें एक हैं।
- वर्त्तमान सरसंघचालक: मोहन राव भागवत
संघ का मुख्य एजेंडा और लक्ष्य (Core Agenda)

संघ व्यक्ति निर्माण के जरिये देश निर्माण का कार्य करती है। संघ का मानना है की एक बार व्यक्ति अपने संस्कार, अनुशासन और राष्ट्र प्रेम के भावना को समझ जाता है, तो इससे व्यक्ति द्वारा राष्ट्र के निर्माण में योगदान बढ़ता होता है। संघ के दीर्घकालिक और अल्पकालिक RSS Agenda में निम्नलिखित बातें मुख्य रूप से शामिल रहती हैं:
- हिंदू समाज का संगठन: जाति, पंथ और भाषा के भेदों को भुलाकर पूरे हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोना।
- अखंड भारत का संकल्प: सांस्कृतिक रूप से प्राचीन भारत की सीमाओं (जो वर्तमान उपमहाद्वीप के कई हिस्सों को जोड़ती है) की एकता और अखंडता की बात करना।
- स्वदेशी की भावना: आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए भारतीय उत्पादों और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देना।
- सामाजिक समरसता: समाज से छुआछूत और जातिगत भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करने के लिए ‘सामाजिक समरसता मंच’ के माध्यम से काम करना।
RSS Identity and Philosophy (आरएसएस की विचारधारा)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझने के लिए सबसे पहले उसके मूल विचार यानी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ (Cultural Nationalism) को समझना होगा। संघ की नजर में ‘हिंदू’ कोई मजहब या उपासना पद्धति नहीं है, बल्कि यह इस महान उपमहाद्वीप की एक प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और जीवन शैली (Way of Life) है।
वर्त्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के द्वारा ‘भारत में जन्मे हर व्यक्ति भारतीय है, चाहे वो मुश्लिम, क्रिश्चन या कोई और पंथ के मानाने वाला व्यक्ति हिन्दू है।’ वे हिन्दू को भारतीय शब्द से समान्तर मानते है। अभी के मुश्लिम, क्रिश्चन के पूर्वज पहले हिन्दू ही था। बाद में उनकी आस्था एवं पूजा-पद्धति बदलने से वे कुछ और नहीं बल्कि हिन्दू ही हैं।
संघ के दूसरे सरसंघचालक श्री गुरुजी गोलवलकर और वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कई बार स्पष्ट किया है कि भारत की भूमि पर रहने वाले, इसे अपनी मातृभूमि मानने वाले और इसकी साझी संस्कृति को जीने वाले सभी लोग सांस्कृतिक रूप से हिंदू हैं, चाहे उनकी पूजा पद्धति कुछ भी क्यों न हो।
संघ का वैचारिक एजेंडा
- औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति: संघ का मानना है कि भौतिक स्वतंत्रता मिलने के बाद भी देश के नागरिकों का मानसिक और बौद्धिक रूप से ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ (Colonial Mindset) से मुक्त होना बाकी है। संघ ‘स्व’ (Selfhood) के विचार को जगाने का काम करता है।
- अखंड और समरस समाज: जाति, ऊंच-नीच, पंथ और क्षेत्रीय भेदभाव की दीवारों को तोड़कर संपूर्ण हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोना संघ का प्राथमिक एजेंडा है।
- परम वैभव की प्राप्ति: संघ का अंतिम लक्ष्य भारत को वैश्विक पटल पर एक ऐसी ‘न्यायपूर्ण और नैतिक शक्ति’ (Righteous Power) के रूप में स्थापित करना है, जो दुनिया को शोषण के बजाय ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ (विश्व कल्याण) का मार्ग दिखा सके।
संघ की यह विचारधारा पश्चिमी देशों के ‘फासीवाद’ या ‘उग्र राष्ट्रवाद’ के ढांचे से बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसका आधार विनाश नहीं, बल्कि समाज का ‘चरित्र निर्माण’ और ‘आध्यात्मिक चेतना’ है।
आरएसएस धरातल पर क्या करता है? (What does RSS do?)
दुनिया में शायद ही कोई ऐसा संगठन होगा जो बिना किसी लिखित सदस्यता फॉर्म, बिना किसी फीस और बिना किसी तामझाम के लाखों लोगों को दैनिक रूप से एकत्र करता हो। संघ की इस अद्भुत शक्ति का रहस्य है उसकी ‘दैनिक शाखा’।
अभी तक लिखित रूप से कोई ऐसा प्रमाण नहीं है कि आरएसएस कुछ करता है। मुस्लिम या अन्य पंथ वाले को परेशान करता है। आइये What does RSS do जानिए सुबह की शाखा से लेकर सेवा कार्यों तक का पूरा सच जानते है। संघ की कार्यप्रणाली बेहद अनुशासित और विस्तृत है, जो मुख्य रूप से तीन स्तरों पर दिखती है:
आरएसएस की दैनिक शाखाएं (The Daily Shakha)

लोगों को लगता है कि सुबह की शाखा का सच पता नहीं है। उन्हें लगता है आरएसएस सुबह की शाखा में ट्रेनिंग देता है। लेकिन ये सरासर गलत आरोप है। हर दिन देश के हजारों मैदानों में सुबह या शाम को एक घंटे के लिए स्वयंसेवक एकत्र होते हैं। भगवा ध्वज (जिसे संघ अपना गुरु मानता है और जो त्याग व समर्पण का प्रतीक है) के सम्मुख स्वयंसेवक कतारबद्ध होते हैं। यह एक घंटे की शाखा संघ की बुनियादी इकाई है। देश भर के मैदानों में सुबह या शाम को लगने वाली इन शाखाओं में:
- शारीरिक विकास: खेल-कूद, सूर्य नमस्कार, योग और समता (मार्च पास्ट) के जरिए शरीर को सुदृढ़ बनाया जाता है। ये शारीरिक व्यायाम, योग और खेल-कूद के माध्यम से देशभक्ति सिखाया जाता है।
- बौद्धिक विकास: देशभक्ति के गीत (गीत), सुभाषित और देश की समसामयिक परिस्थितियों पर चर्चा (बौद्धिक) के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाई जाती है। देशभक्ति के गीत और बौद्धिक चर्चाओं से भारत की वर्तमान और इतिहास की स्थिति बताई जाती है।
- संस्कार: बिना किसी ऊंच-नीच के भेदभाव के, एक साथ बैठना और प्रार्थना करना स्वयंसेवकों में ‘अहं’ को मिटाकर ‘वयम्’ (हम) की भावना भरता है। स्वयंसेवकों में अनुशासन, आज्ञाकारिता और सामूहिक भावना का विकास किया जाता है।
आरएसएस का आपदा प्रबंधन और सेवा कार्य (Social Service)
शाखा का उद्देश्य केवल एक घंटे मैदान में बिताना नहीं है। शाखा वास्तव में एक ‘संस्कार केंद्र’ है, जहाँ तैयार हुआ स्वयंसेवक बाकी के 23 घंटे समाज की सेवा में लगाता है। संघ का सेवा कार्यों का विशाल साम्राज्य है। जब भी देश पर कोई संकट आता है (जैसे बाढ़, भूकंप या कोरोना महामारी), संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले मदद के लिए आगे आते हैं।
- तत्काल आपदा प्रबंधन: भारत में चाहे कोई भूकंप आए, बाढ़ आए, रेल दुर्घटना हो या कोरोना जैसी महामारी—संघ के स्वयंसेवक बिना किसी सरकारी आदेश या व्यक्तिगत लाभ के, जान जोखिम में डालकर सबसे पहले राहत सामग्री के साथ मौके पर पहुँचते हैं।
- लाखों सेवा प्रकल्प: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित होकर आज समाज के वंचित, गरीब और जनजातीय क्षेत्रों में 1.77 लाख से अधिक सेवा कार्य चलाए जा रहे हैं। इनमें मुफ्त अस्पताल, एकल विद्यालय (विद्या भारती के तहत स्कूल), छात्रावास और कौशल विकास केंद्र शामिल हैं।
- समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा कार्य: अंतर्गत देश भर में हजारों स्कूल (जैसे विद्या भारती), अस्पताल, और कल्याणकारी केंद्र चलाए जा रहे हैं।
RSS Agenda में प्रथम सेवा कार्य ही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर दुनिया भर में वैचारिक और राजनीतिक चर्चाएं चाहे जो भी हों, लेकिन धरातल पर इसके सेवा कार्यों की विशालता को इसके विरोधी भी नकार नहीं पाते। संघ का मूल मंत्र है “नर सेवा ही नारायण सेवा है।”
1962 के भारत-चीन युद्ध की विषम परिस्थितियों से लेकर देश के सबसे सुदूर और उपेक्षित आदिवासी अंचलों में शिक्षा की अलख जगाने वाले ‘एकल विद्यालय’ तक, संघ के सेवा कार्यों का इतिहास बेहद दिलचस्प और अभूतपूर्व रहा है।
1962 का भारत-चीन युद्ध: जब नेहरू भी हुए स्वयंसेवकों के मुरीद
साल 1962 में जब चीन ने भारत पर अचानक आक्रमण किया, तब देश की सेना और व्यवस्था इस अप्रत्याशित हमले के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थी। सेना सीमा पर मोर्चे संभाले हुए थी, लेकिन देश के भीतर कानून-व्यवस्था, रसद (सप्लाई) और सिविल डिफेंस को संभालने के लिए जनशक्ति की भारी कमी थी।
ऐसे नाजुक समय में तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी गोलवलकर के आह्वान पर देश भर के आरएसएस स्वयंसेवकों ने मोर्चा संभाला।
स्वयंसेवकों का वो अभूतपूर्व योगदान
- मिलिट्री और पुलिस की मदद: सैनिकों की कमी को देखते हुए स्वयंसेवकों ने दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहरों में ट्रैफिक कंट्रोल की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली ताकि पुलिस बल को फ्री करके आंतरिक सुरक्षा में लगाया जा सके।
- सैनिकों के लिए रसद और रक्तदान: देश भर के रेलवे स्टेशनों पर स्वयंसेवकों ने मोर्चे पर जा रहे सैनिकों के लिए भोजन, चाय और दवाइयों के लंगर लगाए। मिलिट्री अस्पतालों में घायल सैनिकों के लिए स्वयंसेवकों की लंबी कतारें रक्तदान के लिए खड़ी रहीं।
- शहीदों के परिवारों की देखभाल: युद्ध में शहीद हुए जवानों के परिवारों को संबल देने और उनके पुनर्वास के लिए स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर मदद पहुंचाई।
ऐतिहासिक सच: संघ के इस निःस्वार्थ राष्ट्र धर्म और अनुशासन से प्रभावित होकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (जो वैचारिक रूप से संघ के कड़े आलोचक थे) ने 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में संघ को शामिल होने का विशेष निमंत्रण दिया। 26 जनवरी 1963 को राजपथ पर 3,000 स्वयंसेवकों ने अपने पूर्ण गणवेश (यूनिफॉर्म) में कदमताल करते हुए परेड में भाग लिया था।
संकट के समय ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ (सबसे पहले पहुंचने वाले)
भारत में चाहे कोई भी प्राकृतिक या मानव-निर्मित आपदा आई हो, एक दृश्य हमेशा कॉमन रहा है— मलबे और पानी के बीच खाकी हाफ पैंट (अब फुल पैंट) और सफेद कमीज में राहत सामग्री बांटते स्वयंसेवक।
प्रमुख ऐतिहासिक आपदाएं और संघ की भूमिका
- 1971 का भारत-पाक युद्ध और विभाजन: बांग्लादेश से आए लाखों शरणार्थियों के लिए शिविर लगाना और घायलों की सेवा करना।
- 1999 का ओडिशा चक्रवात और 2001 का भुज भूकंप: गुजरात के भुज में जब विनाशकारी भूकंप आया, तो सेना के पहुंचने से पहले स्थानीय स्वयंसेवकों ने मलबे से लाशें निकालना और घायलों को अस्पताल पहुंचाना शुरू कर दिया था। उस समय विदेशी मीडिया ने भी संघ के मैनेजमेंट की तारीफ की थी।
- 2004 की सुनामी और 2013 की केदारनाथ त्रासदी: पहाड़ों की कंदराओं से लेकर समुद्र तटों तक स्वयंसेवकों ने बहे हुए लोगों के शवों का ससम्मान अंतिम संस्कार किया और अनाथ हुए बच्चों को गोद लिया।
वनवासी कल्याण आश्रम: आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ना
ब्रिटिश काल से ही भारत के सुदूर जंगलों और पहाड़ों में रहने वाले ‘वनवासियों’ (आदिवासियों) को समाज की मुख्यधारा से काटकर अलग-थलग रखा गया था। इसी का फायदा उठाकर कई विदेशी मिशनरियों ने वहां बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का खेल शुरू किया।
इस चुनौती से निपटने और वनवासियों के जल-जंगल-जमीन व संस्कृति की रक्षा के लिए 1952 में बालासाहेब देशपांडे ने संघ की प्रेरणा से ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ की स्थापना की। अतः RSS Agenda था की सुदूर बैठे भाई-बहन हमसे (भारत) से दूर न हो। उनका उचित उपचार और अच्छी शिक्षा के लिए संघ ने कई कार्य किये।
- कार्य: आज यह संगठन देश के लगभग हर जनजातीय जिले में सक्रिय है। इसके तहत हजारों खेल केंद्र, हॉस्टल, और चिकित्सा केंद्र चलाए जा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि आज देश के सुदूर पूर्वोत्तर राज्यों (नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल) के जनजातीय युवा खेलों और शिक्षा में भारत का नाम रोशन कर रहे हैं।
एकल विद्यालय: सुदूर गांवों में ‘एक शिक्षक, एक स्कूल’ की क्रांति
संघ के सेवा कार्यों में सबसे अनूठा और दुनिया का सबसे बड़ा ग्रामीण शिक्षा अभियान है ‘एकल विद्यालय’ (Ekal Vidyalaya)। इसकी परिकल्पना 1980 के दशक में की गई थी, जिसका उद्देश्य उन सुदूर गांवों तक शिक्षा पहुंचाना था जहां कोई सरकारी स्कूल या सड़क तक नहीं थी।
क्या है एकल विद्यालय मॉडल?
यह कोई बड़ी आलीशान बिल्डिंग नहीं होती। गांव के ही किसी पेड़ के नीचे या किसी के घर के बरामदे में यह स्कूल चलता है।
- एक शिक्षक, एक स्कूल: गांव के ही किसी पढ़े-लिखे युवा या महिला को ट्रेनिंग देकर शिक्षक बनाया जाता है।
- अनौपचारिक शिक्षा: यहाँ बच्चों को केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि बुनियादी गणित, भाषा, स्वच्छता, भारतीय संस्कार, जैविक खेती और नैतिक मूल्य सिखाए जाते हैं।
- विशाल नेटवर्क: वर्तमान में भारत के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में 1 लाख से अधिक एकल विद्यालय चल रहे हैं, जिनमें 28 लाख से ज्यादा बच्चे मुफ्त शिक्षा पा रहे हैं। इस अभियान के लिए इसे भारत सरकार द्वारा ‘गांधी शांति पुरस्कार’ से भी नवाजा जा चुका है।
सेवा भारती: सेवा का आधिकारिक ‘पावरहाउस’
संघ सीधे तौर पर कोई फंड या ट्रस्ट नहीं चलाता। इसके सेवा कार्यों को व्यवस्थित रूप देने के लिए 1989 में ‘सेवा भारती’ नामक संगठन बनाया गया। आज सेवा भारती के बैनर तले पूरे देश में 1,75,000 से अधिक सेवा प्रकल्प चल रहे हैं।
| सेवा का क्षेत्र | मुख्य कार्य |
| शिक्षा | झुग्गी-झोपड़ियों के बच्चों के लिए बालवाड़ी, संस्कार केंद्र और कोचिंग |
| स्वास्थ्य | मोबाइल मेडिकल वैन (चलते-फिरते अस्पताल), मुफ्त डायलिसिस केंद्र और रक्त बैंक |
| स्वावलंबन | गरीब महिलाओं के लिए सिलाई-कढ़ाई केंद्र, कंप्यूटर ट्रेनिंग और लघु उद्योग ट्रेनिंग |
| सामाजिक | अनाथालयों का संचालन और बेसहारा बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम |
संघ का अनुषांगिक संगठन (Affiliated Organizations): संघ परिवार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बारे में एक बात बहुत प्रसिद्ध है— “संघ कोई संगठन नहीं है, बल्कि वह समाज का संगठन है।” इसका मतलब यह है कि संघ खुद को किसी एक दायरे में सीमित नहीं रखता। संघ में तैयार हुए स्वयंसेवक समाज के हर क्षेत्र (राजनीति, शिक्षा, मजदूर, किसान, छात्र, और आदिवासी कल्याण) में जाते हैं और वहां राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर अलग-अलग संगठन बनाते हैं।
इन्हीं संगठनों को ‘अनुषांगिक संगठन’ (Affiliated Organizations) या सामूहिक रूप से ‘संघ परिवार’ कहा जाता है। आरएसएस सीधे तौर पर चुनाव नहीं लड़ता, लेकिन इसके विचारों से प्रेरित होकर समाज के हर क्षेत्र में अलग-अलग संगठन काम कर रहे हैं, जिन्हें ‘संघ परिवार’ कहा जाता है।
अनुषांगिक संगठन क्या होते हैं और ये कैसे काम करते हैं?
कई लोगों को लगता है कि आरएसएस इन सभी संगठनों को सीधे आदेश देता है या नियंत्रित करता है, लेकिन तकनीकी रूप से ऐसा नहीं है।
वैचारिक जुड़ाव: इन संगठनों का ढांचा, इनके अध्यक्ष और इनकी कार्यप्रणाली पूरी तरह स्वतंत्र होती है। लेकिन, इनके भीतर काम करने वाले मुख्य पदाधिकारी (जिन्हें संघ की भाषा में ‘प्रचारक’ या ‘स्वयंसेवक’ कहा जाता है) संघ की विचारधारा से निकले होते हैं।
स्वायत्तता (Independence): प्रत्येक संगठन अपने क्षेत्र की समस्याओं के हिसाब से फैसले लेता है। उदाहरण के लिए, यदि भारतीय मजदूर संघ (BMS) को लगता है कि सरकार की कोई आर्थिक नीति मजदूरों के खिलाफ है, तो वह बीजेपी (BJP) सरकार होने के बावजूद उसका विरोध करने से पीछे नहीं हटता।
समन्वय (Coordination): साल में एक या दो बार संघ के शीर्ष नेतृत्व के साथ इन सभी संगठनों की ‘समन्वय बैठक’ होती है, जहाँ सभी संगठन देश के विकास और अपनी गतिविधियों की रिपोर्ट साझा करते हैं।
संघ के प्रमुख अनुषांगिक संगठनों की सूची (List of RSS Affiliated Organizations)
संघ परिवार आज समाज के लगभग हर हिस्से को कवर करता है। संघ के भारतीय जनता पार्टी (BJP), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP), भारतीय मजदूर संघ (BMS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल जैसे कुछ बड़े संगठन है। RSS Agenda के तहत समाज के हर वर्ग के लोगों के पास अपना कार्य पहुंचना चाहिए। नीचे इसकी विस्तृत सूची को क्षेत्रवार (Sector-wise) वर्गीकृत किया गया है:
संघ की राजनीति पकड़ (Politics)
भारतीय जनता पार्टी (BJP): संघ परिवार का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दल। इसकी स्थापना पहले ‘भारतीय जनसंघ’ (1951) के रूप में हुई थी। जो बाद में 1980 में भाजपा बनी। इसका मुख्य उद्देश्य संघ की सांस्कृतिक और राष्ट्रवाद की नीतियों को सत्ता के माध्यम से लागू करना है।
युवा और छात्र (Youth & Students)
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP): 1949 में स्थापित यह संगठन आज दुनिया का सबसे बड़ा छात्र संगठन है। यह कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में राष्ट्रभक्ति और छात्र हितों के लिए काम करता है।
हिंदू जागरण मंच: युवाओं में राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक गौरव जगाने का कार्य करता है।
मजदूर और किसान (Labor & Farmers)
भारतीय मजदूर संघ (BMS): 1955 में दत्तोपंत ठेंगड़ी जी द्वारा स्थापित यह संगठन आज भारत का सबसे बड़ा केंद्रीय श्रमिक संगठन (Trade Union) है। यह साम्यवादी (Communism) हड़ताल संस्कृति के बजाय ‘मजदूरों का औद्योगीकरण और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण’ के सिद्धांत पर चलता है।
भारतीय किसान संघ (BKS): किसानों के अधिकारों, जैविक खेती (Organic Farming) और ग्रामीण विकास के लिए काम करने वाला देश का अग्रणी संगठन।
शिक्षा और बौद्धिक क्षेत्र (Education & Academia)
विद्या भारती (Vidya Bharati): इसके अंतर्गत देश भर में ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ और ‘सरस्वती विद्या मंदिर’ जैसे 30,000 से अधिक स्कूल चलते हैं। जहाँ आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों के संस्कार दिए जाते हैं।
अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRSM): शिक्षकों और प्राध्यापकों का संगठन जो शिक्षा नीति में सुधार के लिए काम करता है।
भारतीय शिक्षण मंडल: शिक्षा के भारतीयकरण (Decolonizing Education) के लिए शोध और नीतियां तैयार करता है।
सामाजिक और धार्मिक (Social & Religious)
विश्व हिंदू परिषद (VHP): 1964 में स्थापित यह संगठन विदेशों में रहने वाले हिंदुओं को जोड़ने, जातिवाद मिटाने और हिंदू समाज की रक्षा के लिए काम करता है। (श्री राम जन्मभूमि आंदोलन में विहिप की मुख्य भूमिका थी)।
बजरंग दल: विहिप की युवा शाखा, जो सांस्कृतिक रक्षा और युवाओं को संगठित करने का काम करती है।
राष्ट्र सेविका समिति: यह आरएसएस के समानांतर महिलाओं का स्वतंत्र संगठन है (इसे संघ की महिला विंग कहना तकनीकी रूप से गलत होगा, क्योंकि यह पूरी तरह स्वायत्त है)। इसकी स्थापना 1936 में हुई थी।
सेवा और कल्याण (Service & Welfare)
सेवा भारती (Seva Bharati): जैसा कि हमने पिछले लेख में जाना, यह झुग्गी-झोपड़ियों और वंचितों के बीच 1.75 लाख से अधिक सेवा कार्य (अस्पताल, हॉस्टल) चलाता है।
वनवासी कल्याण आश्रम: देश के आदिवासी (जनजातीय) क्षेत्रों में उनके अधिकारों, शिक्षा और संस्कृति की रक्षा के लिए काम करता है।
सक्षम (SAKSHAM): दिव्यांगजनों (Specially-abled) के कल्याण, पुनर्वास और उन्हें समाज में सम्मान दिलाने के लिए समर्पित संगठन।
आर्थिक और तकनीकी (Economic & Technical)
स्वदेशी जागरण मंच (SJM): भारतीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने और विदेशी कंपनियों (MNCs) के अत्यधिक हस्तक्षेप के खिलाफ देश में ‘स्वदेशी आंदोलन’ चलाने वाला संगठन।
विज्ञान भारती (VIBHA): भारतीय वैज्ञानिकों को एकजुट करने और प्राचीन भारतीय विज्ञान के गौरव को आधुनिक संदर्भ में दुनिया के सामने लाने वाला मंच।
इसके आलावा अधिवक्ता परिषद, राष्ट्रीय मुश्लिम मंच, दीन दयाल शोध संस्थान, भारत विकास परिषद, धर्म जागरण समिति, राष्ट्रीय सिख संगत और कई क्षेत्रीय संगठन जैसे 250 से ज्यादा संघ परिवार है।
संघ शताब्दी और वैचारिक यात्रा: राष्ट्र निर्माण के 100 वर्ष और संगठन के विस्तार का असली सच
आज भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) एक ऐसा नाम है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन बोया गया एक छोटा सा बीज आज अपने 100 वर्षों (शताब्दी वर्ष) के सफर को पूरा कर चुका है। आज यह न केवल भारत बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बन चुका है।
इसके बावजूद, देश और दुनिया के राजनीतिक विश्लेषकों के लिए संघ की कार्यप्रणाली और उसकी सफलता हमेशा एक कौतूहल और शोध का विषय रही है। आज भी राजनीतिक गलियारों में संघ को लेकर तरह-तरह के विमर्श चलते हैं। ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर धरातल पर संघ क्या करता है, उसकी वैचारिक यात्रा क्या है और हाल ही में संघ के शीर्ष नेतृत्व द्वारा दिए गए बयानों के गहरे मायने क्या हैं।
अपने शताब्दी वर्ष के परिदृश्य में संघ का रुख
वर्ष 2026 के दौरान संघ के एजेंडे में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव और फोकस क्षेत्र देखे गए थे:
- भविष्य के 25 वर्ष (अमृत काल): संघ ने भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष (2047) पूरे होने तक देश को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बनाने का संकल्प दोहराया था।
- मुस्लिम समुदाय से संवाद: 2022 और उसके आस-पास के महीनों में संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों और धार्मिक नेताओं से मुलाकातें की थीं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि “हिंदू राष्ट्र का मतलब यह नहीं है कि इसमें मुसलमानों के लिए जगह नहीं है।”
- ज्ञानवापी और धार्मिक मुद्दे: 2022 में उठे ज्ञानवापी विवाद पर संघ प्रमुख ने बयान दिया था कि “हर मस्जिद में शिवलिंग तलाशने और नया विवाद खड़ा करने की जरूरत नहीं है,” जिससे संघ के एक संतुलित और परिपक्व रुख का संकेत मिला था।
- महिला सशक्तिकरण: संघ ने अपनी शाखाओं और समाज में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर अधिक जोर देना शुरू किया (राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से)।
संघ के विस्तार का अर्थ राष्ट्रीय विचार का विस्तार
हाल ही में (मार्च 2026 में) समालखा (पानीपत) में आयोजित संघ की सर्वोच्च नीति-निधारक इकाई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) की बैठक संपन्न हुई है। इस बैठक में संघ के सरकार्यवाह (महासचिव) दत्तात्रेय होसबाले जी ने संगठन के अभूतपूर्व विस्तार के आंकड़े साझा किए, जो देश की बदलती वैचारिक दिशा को दर्शाते हैं।
वर्तमान में संघ की दैनिक शाखाओं की संख्या में 6 हजार से अधिक की भारी वृद्धि हुई है, जिससे अब देश भर में 88,000 से अधिक दैनिक शाखाएं संचालित हो रही हैं। संघ का यह काम अब केवल मुख्य शहरों या कस्बों तक सीमित नहीं है, बल्कि लेह-लद्दाख, अंडमान-निकोबार के सुदूर द्वीपों और अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम जनजातीय क्षेत्रों तक पहुँच चुका है।
‘राष्ट्रीय विचार का विस्तार’ क्यों है यह?
दत्तात्रेय होसबाले जी ने स्पष्ट किया कि सांगठनिक रूप से संघ की शाखाओं के बढ़ने का मतलब सिर्फ एक संगठन का बड़ा होना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ समाज में ‘सज्जन शक्ति’ (Power of Good) और राष्ट्रीय विमर्श का मजबूत होना है। जब संघ का विस्तार होता है, तो समाज में निम्नलिखित ‘पंच परिवर्तन’ (Five-fold Transformation) की गति तेज होती है:
- सामाजिक समरसता: समाज से जातिगत भेदभाव और छुआछूत का पूरी तरह खात्मा। संघ ने मीडिया और बुद्धिजीवियों से भी अपील की है कि वे चुनावों या विमर्शों में समाज का जाति आधारित आकलन बंद करें।
- कुटुंब प्रबोधन: पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव के बीच भारतीय पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों को बचाए रखना।
- पर्यावरण-अनुकूल जीवन शैली: जल संरक्षण, प्लास्टिक का न्यूनतम उपयोग और पर्यावरण की रक्षा। यहाँ तक कि संघ अब नागरिकों को अपनी छतों पर जैविक सब्जियां उगाने और गौ-संवर्धन (देसी खाद का उपयोग) के लिए प्रेरित कर रहा है।
- नागरिक कर्तव्य: अधिकारों के साथ-साथ देश के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध कराना।
- स्वदेशी (भारतीय विमर्श): आर्थिक और बौद्धिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
संघ के इस विस्तार का मुख्य संदेश यह है कि “संघ समाज के भीतर कोई अलग संगठन नहीं है, बल्कि वह पूरे समाज को ही संगठित करना चाहता है।” जब पूरा समाज राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने लगेगा, तब संघ के अलग अस्तित्व की आवश्यकता ही स्वतः समाप्त हो जाएगी।
RSS Agenda का वास्तविक सच: एक नज़र में
संक्षेप में कहें तो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंडा (RSS Agenda) केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। इसका मुख्य कार्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचकर राष्ट्र निर्माण की भावना जगाना है। आलोचक जहाँ इसे दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी विचारों वाला संगठन मानते हैं, वहीं इसके समर्थक इसे देश का सबसे अनुशासित और देशभक्त संगठन कहते हैं।
सुबह की शाखा में लाठी घुमाने और नमस्ते सदा वत्सले की प्रार्थना करने वाले स्वयंसेवकों का असली चेहरा इन सेवा कार्यों में नजर आता है। संघ का दर्शन यह मानता है कि जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति शिक्षित, स्वस्थ और आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक राजनीतिक आजादी अधूरी है।
1962 में सीमाओं पर सेना का संबल बनने से लेकर आज देश के अंतिम गांव में ‘एकल विद्यालय’ के जरिए बच्चों का भविष्य संवारने तक—संघ के सेवा कार्य भारत के मूक पुनर्जागरण की कहानी बयां करते हैं। संघ के विस्तार की यह गूंज असल में भारत के ‘परम वैभव’ की ओर बढ़ने और वैश्विक कल्याण के लिए भारतीय विमर्श (Hindutva as a global solution) के स्थापित होने की कहानी है।
अपनी स्थापना के 100 गौरवशाली वर्ष पूरे करने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज भारत की सामूहिक चेतना का प्रतीक बन चुका है। आलोचकों के तमाम दुष्प्रचारों और औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रसित बौद्धिकों के विरोध के बावजूद, संघ ने समाज के अटूट विश्वास को जीता है। सुबह की एक घंटे की शाखा से शुरू हुआ यह कारवां आज देश के सुदूर गांवों में सेवा के दीये जला रहा है।
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