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1981 Bihar Train Accident: भारतीय रेल का वो सबसे काला दिन! जानिए सबसे भीषण रेल हादसा जब बागमती नदी में समा गई थी पूरी ट्रेन

1981 Bihar Train Accident: भारतीय रेल का इतिहास जहाँ एक तरफ देश को आपस में जोड़ने और विकास की नई ऊंचाइयों को छूने का गवाह रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसके पन्नों में कुछ ऐसे काले अध्याय भी दर्ज हैं जिन्हें याद कर आज भी लोगों की रूह कांप जाती है। 

ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला और भारत के इतिहास का सबसे बड़ा रेल हादसा आज से ठीक 45 साल पहले बिहार की धरती पर हुआ था, जिसे दुनिया आज भी 1981 Bihar Train Accident के नाम से जानती है।

यह केवल भारत का ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे भीषण रेल हादसों में से एक माना जाता है। जहाँ पलक झपकते ही हंसती-खेलती और खचाखच भरी एक पूरी पैसेंजर ट्रेन उफनती हुई नदी के गहरे पानी में समा गई थी। 

दैनिक जागरण रिपोर्ट, विकिपीडिया और गाँव के पुराने लोग के अनुसार आइए जानते हैं India Deadliest Rail Disaster की वो पूरी इनसाइड स्टोरी, जो आज भी भारतीय रेल की सुरक्षा व्यवस्था के इतिहास में एक बड़ा सबक है।

1981 Bihar Train Accident: 6 जून 1981 को जब ‘काल’ बनकर आई आंधी और एक फैसला

1981 Bihar Train Accident
Symbolic image: Bagmati River Train Accident

यह खौफनाक 1981 Bihar Train Accident तारीख 6 जून की दोपहर का है। मानसी से सहरसा की ओर जाने वाली 416 डाउन पैसेंजर ट्रेन (Mansi Saharsa Train Crash History) अपने निर्धारित समय से आगे बढ़ रही थी। 

शादी-ब्याह का सीजन होने के कारण ट्रेन के भीतर पैर रखने तक की जगह नहीं थी। लोग न सिर्फ डिब्बों के अंदर ठसाठस भरे थे, बल्कि बड़ी संख्या में लोग ट्रेन की छतों और बोगियों के बीच मौजूद पायदानों पर भी लटके हुए थे।

शाम के करीब 3 बज रहे थे और ट्रेन बदला घाट और धमारा घाट स्टेशनों के बीच बने रेलवे पुल संख्या 51 को पार कर रही थी। जिसके नीचे उफनती हुई बागमती नदी (Bagmati River) बह रही था। इसी दौरान अचानक मौसम ने करवट ली और भीषण आंधी-तूफान के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।

अचानक क्यों नदी में गिर गई ट्रेन? (The Mystery and Causes)

1981 Bihar Train Accident के कारणों को लेकर आज भी कई तरह के दावे और थ्योरी सामने आती हैं, लेकिन मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें बताई जाती हैं:

Bagmati River Train Accident का कारण 1: अचानक ब्रेक लगाना (Emergency Brakes)

कहा जाता है कि जब ट्रेन पुल पार कर रही थी, तब रेल पटरी पर अचानक कोई मवेशी (गाय या भैंस) आ गया था। उसे बचाने के चक्कर में लोको पायलट (ड्राइवर) ने अचानक पूरी ताकत से इमरजेंसी ब्रेक लगा दिए। तेज आंधी और गीली पटरियों पर अचानक ब्रेक लगने से ट्रेन का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया।

Bagmati River Train Accident का कारण 2: तेज आंधी और खिड़कियों का बंद होना

एक अन्य थ्योरी के अनुसार, मूसलाधार बारिश से बचने के लिए ट्रेन के अंदर बैठे सभी यात्रियों ने बोगियों की खिड़कियों को कसकर बंद कर दिया था। भारी आंधी के बीच खिड़कियां बंद होने के कारण हवा का दबाव (Wind Pressure) ट्रेन के आर-पार नहीं हो सका और चक्रवाती हवाओं के थपेड़ों ने पूरी ट्रेन को एक तरफ झुका दिया।

संतुलन बिगड़ने के कारण ट्रेन के 9 में से 7 डिब्बे पटरी से उतर गए और सीधे पुल के नीचे बह रही बागमती नदी के गहरे पानी में समा गए। देखते ही देखते चारों तरफ चीख-पुकार मच गई और सैकड़ों लोग पानी के तेज बहाव में बह गए।

कितने लोगों की हुई थी मौत? सरकारी और गैर-सरकारी आंकड़ों में अंतर

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बिहार के बागमती नदी पर पुल पार करते समय पटरी से उतरी ट्रेन; image credit Dainik Jagran

इस वैश्विक 1981 Bihar Train Accident में जान गंवाने वाले लोगों की सटीक संख्या आज तक एक रहस्य बनी हुई है, क्योंकि उस दौर में अनारक्षित (Unreserved) बोगियों में यात्रियों का कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं होता था:

सरकारी आंकड़े: तत्कालीन सरकारी दावों के अनुसार, इस दुर्घटना में मरने वालों की संख्या करीब **250 से 300** के बीच बताई गई थी।

गैर-सरकारी और स्थानीय दावे: स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों, पत्रकारों और जीवित बचे लोगों के अनुसार, उस ट्रेन में 1,000 से अधिक लोग सवार थे। 

नदी से कई दिनों तक लाशें निकलती रहीं और कई शव तो बहकर मीलों दूर चले गए। अनुमान के मुताबिक इस 1981 Bihar Train Accident में 500 से 800 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।

1981 Bihar Train Accident में राहत और बचाव कार्य में आई थीं बड़ी चुनौतियां

चुनौतियां (Challenges) विवरण और प्रभाव (Details)
खराब मौसम और कनेक्टिविटी1981 के उस दौर में न तो मोबाइल फोन थे और न ही आधुनिक क्रेन। भारी बारिश और बाढ़ के कारण कटक-सहरसा का इलाका पूरी तरह कट चुका था, जिससे राहत दल को पहुंचने में घंटों लग गए।
गोताखोरों की कमीसेनाऔर नौसेना के गोताखोरों (Divers) को बुलाने में काफी समय लगा। तब तक स्थानीय मल्लाहों और ग्रामीणों ने अपनी नावों के जरिए नदी में कूदकर कई लोगों की जान बचाई।
मछलियों और मगरमच्छों का खौफबागमती नदी के उस गहरे हिस्से में पानी का बहाव इतना तेज था कि मलबे से शवों को निकालना बेहद खतरनाक साबित हो रहा था। कई शव क्षत-विक्षत हालत में मिले थे।

इस हादसे ने कैसे बदली ‘Indian Railway Safety History’?

सुरक्षा के कड़े नियम: इस महा-दुर्घटना के बाद भारतीय रेलवे के सुरक्षा तंत्र में बड़े बदलाव किए गए। पुलों के ऊपर से गुजरने के दौरान ट्रेनों की गति सीमा (Speed Limit) को बेहद कड़ा किया गया। पुराने पुलों का स्ट्रक्चरल ऑडिट अनिवार्य किया गया और भविष्य में ऐसी स्थिति से निपटने के लिए रेलवे में आपदा प्रबंधन (Disaster Management) की नींव मजबूत की गई।

6 जून 1981 का वह काला दिन आज भी बिहार और पूरे देश के इतिहास में एक ऐसा घाव है जो कभी नहीं भर सकता। बागमती नदी के पुल नंबर 51 के पास से गुजरने वाली ट्रेनें आज भी जब वहां से निकलती हैं, तो यात्री उस खौफनाक मंजर को याद कर सिहर उठते हैं।

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Shivji Kumar
Shivji Kumarhttp://samvadshiv.com
I am a student and also a bit of a thinker. I am a freelance journalist. I am fond of writing, I have been writing for the last 5 years.
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